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Wednesday, March 4, 2009

My first shayari

This is how a little thought grow up and finally develops into a Ghazal. Today I was just thinking of this few lines in my mind, then I tell this to some of my close friends, and here you are:
प्यार
बसता है कभी, फूल में खुशबू बनकर

याद जगती है कभी, रात में जुगनू बनकर

काँटों से भरी ज़िंदगी में ग़म की क्या परवाह करें
जिगर का खून है, बहता है जो आँसू बनकर


वो इक लम्हा जो तेरे साथ बिताया था कभी
दिल मे बजता है, तेरी याद का घुँघरू बनकर


तू ही ना जब मिली तो दुनिया का क्या करें
निकल जाएँगे कहीं राह में साधु बनकर


कैसे जीता है कोई दर्द-ए-मोहब्बत के बिना
हम भी देखेंगे कभी ख्वाब में "तू" बनकर


दर्द को उसके, कैसे मैं भुला दूं "सागर"
दिल में बहता है वही दर्द जब लहू बनकर

Friday, September 19, 2008

Something I liked

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला
वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला

क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे इस से
वो जो एक शख्स है मुह फेर के जाने वाला

मुंतज़िर किस का हूँ टूटी हुई देहलीज़ पे मैं
कौन आएगा यहाँ कौन है आने वाला

मैं ने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख्वाब की ताबीर बताने वाला?

तुम तकल्लुफ को भी इखलास समझते हो 'फ़राज़'
दोस्त होता नही हर हाथ मिलाने वाला